परिचय
मीमांसा (संस्कृत: मीमांसा, शाब्दिक अर्थ “चिन्तन,” “अन्वेषण,” या “समीक्षात्मक परीक्षा”) हिन्दू दर्शन के छह आस्तिक सम्प्रदायों (षड्दर्शन) में से एक है, जो वेदों की व्यवस्थित व्याख्या और वैदिक कर्मकाण्ड (कर्म-काण्ड) के दार्शनिक समर्थन को समर्पित है। जहाँ अन्य सम्प्रदायों ने चेतना, परमाणु या परमतत्त्व की प्रकृति पर विचार-विमर्श किया, मीमांसा ने एक अधिक मूलभूत प्रश्न उठाया: वेद का अर्थ क्या है, और हमें क्या करना चाहिए?
इस प्रश्न की खोज में, मीमांसा ने विश्व बौद्धिक इतिहास में भाषा, व्याख्या और आदर्शात्मक कर्म का सर्वाधिक परिष्कृत दर्शन विकसित किया। यह सम्प्रदाय पूर्व मीमांसा (“पूर्व अन्वेषण”) के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह वेदों के पूर्ववर्ती कर्मकाण्ड भाग (संहिता और ब्राह्मण) से सम्बन्धित है, उत्तर मीमांसा (“उत्तरवर्ती अन्वेषण”) के विपरीत, जो वेदान्त का दूसरा नाम है और उपनिषदों की व्याख्या करता है।
जैमिनि: संस्थापक
मीमांसा सम्प्रदाय की स्थापना का श्रेय महर्षि जैमिनि (संस्कृत: जैमिनि) को दिया जाता है। परम्परागत वृत्तान्त जैमिनि को व्यास (वेदों और महाभारत के संकलनकर्ता) का शिष्य बताते हैं। जैमिनि को व्यास से साम वेद प्राप्त करने का श्रेय भी दिया जाता है। विद्वानों के अनुमान जैमिनि की तिथि 4थी से 2री शताब्दी ई.पू. के बीच रखते हैं।
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, जैमिनि को एक बार विन्ध्य पर्वतों में बोलने वाले पक्षी मिले — वस्तुतः एक ऋषि के शापित पुत्र — जिन्होंने उन्हें गहन दार्शनिक सत्य प्रकट किए। यह कथा “जैमिनि और पक्षी” की प्रसिद्ध चित्रकला परम्परा का आधार बनी।
मीमांसा सूत्र
मीमांसा सूत्र (मीमांसासूत्र) सभी दर्शन सूत्र ग्रन्थों में सबसे विशाल है, जिसमें लगभग 2,745 सूत्र बारह अध्यायों में संगठित हैं। यह विशालता व्याख्यात्मक उद्यम की जटिलता को दर्शाती है।
ग्रन्थ का आरम्भ प्रसिद्ध सूत्र से होता है: “अथातो धर्मजिज्ञासा” — “अब, अतः, धर्म की जिज्ञासा” (मीमांसा सूत्र 1.1.1)। यह आरम्भ ब्रह्मसूत्र के “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” के समानान्तर है, जो पूर्व और उत्तर मीमांसा के पूरक सम्बन्ध को रेखांकित करता है।
प्रमुख टीकाकारों में शबर (लगभग 1ली-5वीं शताब्दी) का शबरभाष्य, कुमारिल भट्ट (लगभग 7वीं शताब्दी) का श्लोकवार्त्तिक, और प्रभाकर (लगभग 7वीं शताब्दी) का बृहती सम्मिलित हैं।
धर्म: केन्द्रीय अवधारणा
मीमांसा की परिभाषित अवधारणा धर्म (धर्म) है, जिसे विशेष रूप से वैदिक विधि द्वारा आदिष्ट कर्तव्य के रूप में समझा जाता है: “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः” (मीमांसा सूत्र 1.1.2)। यह परिभाषा सटीक और परिणामकारी है:
- धर्म कोई सार्वभौमिक सिद्धान्त, प्राकृतिक नियम, या तात्त्विक अवधारणा नहीं — यह वेद द्वारा निर्दिष्ट कर्तव्य है
- यह प्रत्यक्ष, अनुमान या किसी सामान्य प्रमाण से नहीं जाना जा सकता — यह केवल वैदिक शब्द-प्रमाण से ज्ञात होता है
- वेद का प्रमुख कार्य कर्म का विधान (विधि) करना है, न कि जगत् के विषय में तथ्य बताना
छह प्रमाण
मीमांसा की ज्ञानमीमांसा सर्वाधिक विस्तृत है, जो छह प्रमाण स्वीकार करती है:
- प्रत्यक्ष (संवेदन): विषयों का प्रत्यक्ष इन्द्रिय-ग्रहण
- अनुमान (तर्क): प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर तार्किक विचार
- उपमान (तुलना): समानता को पहचानने से ज्ञान
- शब्द (प्रमाण-वचन): विश्वसनीय स्रोत का वचन, सर्वोपरि वेद
- अर्थापत्ति (आवश्यक अनुमान): आवश्यक पूर्वधारणा से ज्ञान — यदि देवदत्त जीवित है किन्तु घर पर नहीं, तो अनुमान होता है कि वह कहीं और है
- अनुपलब्धि (अभाव-ज्ञान): किसी वस्तु के प्रत्यक्ष न होने से उसकी अनुपस्थिति का ज्ञान
स्वतःप्रामाण्य: ज्ञान की स्वतःवैधता
मीमांसा के सर्वाधिक प्रभावशाली सिद्धान्तों में स्वतःप्रामाण्य है — ज्ञान की आन्तरिक वैधता। इस सिद्धान्त के अनुसार, प्रत्येक प्रतीति स्वभावतः वैध है; अवैधता को एक पृथक् प्रतीति द्वारा सिद्ध करना होता है। चूँकि वेद किसी मानवीय लेखक की रचना नहीं जो भूल कर सके, अतः वैदिक प्रमाण की वैधता पर सन्देह का कोई आधार नहीं।
शब्द की नित्यता
मीमांसा यह क्रान्तिकारी सिद्धान्त प्रस्तुत करता है कि शब्द और उनका अर्थों से सम्बन्ध शाश्वत है। वेद किसी लेखक की रचना नहीं — न मानवीय, न दैवी। वेद अपौरुषेय (लेखक-रहित) है, शाश्वत रूप से विद्यमान और प्रत्येक सृष्टि-चक्र में पुनः प्रकट होने वाला।
कुमारिल भट्ट और भाट्ट सम्प्रदाय
कुमारिल भट्ट (लगभग 620-700 ई.) सर्वाधिक प्रभावशाली मीमांसा दार्शनिक थे, जिनके ग्रन्थों ने इस सम्प्रदाय को कर्मकाण्डीय व्याख्या-शास्त्र से एक व्यापक दार्शनिक परम्परा में रूपान्तरित कर दिया। उनका श्लोकवार्त्तिक भारतीय दर्शन की एक उत्कृष्ट कृति है।
भाट्ट सम्प्रदाय के प्रमुख सिद्धान्त:
- ज्ञान स्वप्रकाश है किन्तु परवर्ती मानसिक क्रिया द्वारा ज्ञात होता है
- भ्रान्ति-सिद्धान्त — विपरीतख्याति: भ्रम में मन किसी वस्तु को उससे भिन्न रूप में ग्रहण करता है
- भावना (उत्पादक क्रिया): कुमारिल का विश्लेषण कि वैदिक विधियाँ किस प्रकार भावना की अवधारणा द्वारा कर्म को प्रेरित करती हैं
कुमारिल बौद्ध धर्म की विनाशकारी आलोचना के लिए भी प्रसिद्ध हैं, विशेषतः क्षणिकवाद और अनात्मवाद के विरुद्ध उनके तर्क। भारत में उनकी बौद्धिक विजय ने बौद्ध धर्म के ह्रास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रभाकर और प्राभाकर सम्प्रदाय
प्रभाकर मिश्र (लगभग 7वीं शताब्दी), कुमारिल के समकालीन और प्रतिद्वन्द्वी, ने मीमांसा का दूसरा प्रमुख उप-सम्प्रदाय स्थापित किया। प्रभाकर के प्रमुख भेद:
- ज्ञान स्वप्रकाश और स्वज्ञात है: प्रत्येक प्रतीति एक साथ स्वयं को, विषय को, और ज्ञाता-विषय को प्रकट करती है — त्रिपुटी-प्रत्यक्ष का सिद्धान्त
- भ्रान्ति-सिद्धान्त — अख्याति: भ्रम विपरीत ग्रहण नहीं बल्कि दो प्रतीतियों के भेद को ग्रहण न करना है
- कर्तव्य स्वतः प्रेरक है: वैदिक विधि अपने बल से ही कर्तव्य उत्पन्न करती है, फल की कामना की आवश्यकता नहीं
पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा (वेदान्त)
पूर्व मीमांसा वेद के कर्म-काण्ड (कर्मकाण्डीय भाग) से और उत्तर मीमांसा (वेदान्त) ज्ञान-काण्ड (ज्ञान भाग — उपनिषद) से सम्बन्धित है। कुछ चिन्तकों, विशेषतः मण्डन मिश्र ने, दोनों को एक पद्धति में समन्वित करने का प्रयास किया जहाँ कर्मकाण्ड मन को शुद्ध करता है और उपनिषदों में सिखाए गए मुक्तिदायी ज्ञान के लिए तैयार करता है।
मीमांसा के व्याख्या-सिद्धान्त
मीमांसा के वैदिक ग्रन्थों की व्याख्या के नियम सम्पूर्ण भारतीय सभ्यता में विधिक और ग्रन्थ-व्याख्या का आधार बने। इन सिद्धान्तों ने धर्मशास्त्र (हिन्दू न्यायशास्त्र) को गहराई से प्रभावित किया, जहाँ उनका उपयोग विधिक ग्रन्थों की व्याख्या में किया गया। मनुस्मृति पर महान विधि-टीकाकार मेधातिथि (9वीं शताब्दी) स्पष्ट रूप से मीमांसा व्याख्या-पद्धति का प्रयोग करते हैं।
विरासत और प्रभाव
मीमांसा का प्रभाव इसके अपने सम्प्रदाय से बहुत आगे फैला है:
- हिन्दू विधि: मीमांसा व्याख्या-शास्त्र भारतीय न्यायशास्त्र में विधिक व्याख्या की मानक पद्धति बना
- वेदान्त: मीमांसा के कर्मकाण्डवाद को अस्वीकार करने वाले सम्प्रदायों ने भी इसका ज्ञानमीमांसात्मक ढाँचा अपनाया, विशेषतः स्वतःप्रामाण्य और अपौरुषेयत्व
- भाषा-दर्शन: मीमांसा के वाक्यार्थ, शब्दार्थ-सम्बन्ध और कार्यात्मक भाषा के विश्लेषण आधुनिक भाषा-दर्शन के विकासों का पूर्वाभास हैं
- मन्दिर-पूजन: हिन्दू मन्दिरों की विस्तृत पूजन-विधियाँ मीमांसा के वैदिक कर्मकाण्ड सिद्धान्तों पर आधारित हैं
जैसा कि मीमांसा सूत्र (1.1.2) संक्षिप्त सटीकता से परिभाषित करता है: “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः” — “धर्म वह है जो वैदिक विधि द्वारा लक्षित है।”