लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली (Lakṣmī Aṣṭottara Śatanāmāvalī, “लक्ष्मी के 108 नामों की माला”) हिन्दू पूजा में सबसे व्यापक रूप से पठित भक्ति स्तोत्रों में से एक है, जो देवी लक्ष्मी — भगवान विष्णु की दिव्य पत्नी और धन (धन), समृद्धि (सम्पत्ति), सौन्दर्य (सौन्दर्य), कृपा (कृपा), और आध्यात्मिक ऐश्वर्य (ऐश्वर्य) की सर्वोच्च प्रतीक — के 108 पवित्र नामों का पाठ करता है।
108 नामों की परम्परा
108 संख्या का महत्त्व
हिन्दू ब्रह्माण्ड विज्ञान, गणित और आध्यात्मिक साधना में 108 संख्या का गहन पवित्र महत्त्व है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार सूर्य और पृथ्वी की दूरी लगभग सूर्य के व्यास की 108 गुनी है, और चन्द्रमा-पृथ्वी की दूरी चन्द्रमा के व्यास की लगभग 108 गुनी है। संस्कृत वर्णमाला में 54 अक्षर हैं, प्रत्येक के शिव (पुल्लिंग) और शक्ति (स्त्रीलिंग) पक्ष मिलकर 108 बनते हैं। 27 नक्षत्रों के प्रत्येक 4 पाद — कुल 108। जप माला में 108 मनके होते हैं।
अष्टोत्तर शतनाम परम्परा — 108 नामों की गणना — लगभग प्रत्येक प्रमुख हिन्दू देवता के लिए विद्यमान है: विष्णु, शिव, गणेश, सरस्वती, हनुमान आदि। ये नाम-सूचियाँ एक साथ धार्मिक सूची (देवता के गुणों को परिभाषित करना), भक्ति सहायक (ध्यानपूर्ण पुनरावृत्ति हेतु संरचना), और रक्षात्मक मन्त्र (कवच) का कार्य करती हैं।
पौराणिक स्रोत
लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली मुख्यतः पद्म पुराण और स्कन्द पुराण से ली गई है। पद्म पुराण (उत्तर खण्ड) में नारद मुनि द्वारा भक्तों को प्रदान की गई सबसे प्रामाणिक 108 नामों की सूची है। स्कन्द पुराण (विष्णु खण्ड) में कुछ भिन्नताओं सहित एक पूरक सूची है। विष्णु पुराण (1.8–9) समुद्र मन्थन से लक्ष्मी के प्राकट्य की मूल कथा प्रदान करता है।
प्रमुख नामों के अर्थ
कमल (पद्म) से सम्बन्धित नाम
- पद्मा — “वह जो कमल हैं” — सबसे प्रतिष्ठित नाम, कीचड़ में खिलने वाले किन्तु निर्मल कमल का प्रतीक।
- पद्मालया — “वह जिनका निवास कमल है।”
- कमला — “कमलवाली” — लक्ष्मी का स्वतन्त्र नाम, दस महाविद्याओं में से एक।
- पद्महस्ता — “वह जिनके हाथ में कमल है।“
धन-समृद्धि से सम्बन्धित नाम
- श्री — “समृद्धि, सौन्दर्य, कृपा” — लक्ष्मी का सबसे मूलभूत और प्राचीन नाम। वैदिक श्री सूक्तम् सबसे प्राचीन स्तुति है।
- हिरण्मयी — “स्वर्णमयी” — लक्ष्मी को स्वर्ण से जोड़ने वाला नाम।
- लक्ष्मी — “वह जो लक्ष्य हैं” — संस्कृत धातु लक्ष् (देखना, जानना) से।
- सिद्धि — “सिद्धि, पूर्णता” — सभी प्रयासों को सफल बनाने वाली।
विष्णु से सम्बन्धित नाम
- हरिप्रिया — “हरि (विष्णु) की प्रिया।”
- विष्णुपत्नी — “विष्णु की पत्नी।”
- वैष्णवी — “विष्णु से सम्बन्धित।”
- नारायणी — “नारायण की शक्ति।“
ब्रह्माण्डीय कार्यों से सम्बन्धित नाम
- प्रकृति — “आदि प्रकृति” — सृष्टि का मूल रचनात्मक तत्त्व।
- विद्या — “ज्ञान” — समस्त ज्ञान का स्वरूप।
- श्रद्धा — “आस्था” — भक्ति-श्रद्धा का स्वरूप।
- स्वाहा — वैदिक आहुति का पवित्र उद्घोष, लक्ष्मी को यज्ञ कर्म से जोड़ता है।
शुक्रवार लक्ष्मी पूजा से सम्बन्ध
हिन्दू पंचांग में शुक्रवार (शुक्रवार) देवी लक्ष्मी का दिन है। शुक्र ग्रह सौन्दर्य, प्रेम, धन और भौतिक सुख का अधिपति है — ये सभी लक्ष्मी के क्षेत्र हैं। शुक्रवार लक्ष्मी पूजा में अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ केन्द्रीय अंग है। पूजा में दीप प्रज्वलन, पुष्प अर्पण (विशेषकर कमल, गेंदा, चमेली), श्री सूक्तम् का पाठ, 108 नामों का जप, और प्रसाद वितरण (पोंगल, पायसम, या फल) शामिल है। प्रत्येक नाम के साथ एक पुष्प, हल्दी या चावल का दाना अर्पित किया जाता है।
दीपावली पूजा में उपयोग
दीपावली पर — कार्तिक अमावस्या की रात — लक्ष्मी पूजा का केन्द्रीय अनुष्ठान है जिसमें 108 नामों का पाठ मुख्य धार्मिक कार्य है। पद्म पुराण और स्कन्द पुराण के अनुसार लक्ष्मी कार्तिक अमावस्या की रात समुद्र मन्थन से प्रकट हुईं और विष्णु को अपना शाश्वत पति चुना। दीपावली पर दीपों का प्रज्वलन लक्ष्मी को गृह में आमन्त्रित करना है।
गुजरात, राजस्थान और उत्तर भारत के व्यापारी समुदायों में दीपावली नवीन वित्तीय वर्ष का आरम्भ भी है, और अष्टोत्तर का पाठ बही-खातों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर आगामी वर्ष की समृद्धि हेतु किया जाता है।
श्री वैष्णव परम्परा में महत्त्व
श्री वैष्णव परम्परा में, जिसकी स्थापना रामानुजाचार्य (1017–1137 ई.) ने की, लक्ष्मी (श्री) केवल पत्नी या अधीनस्थ देवी नहीं बल्कि दिव्य मध्यस्थ (पुरुषकार) हैं — जीवात्मा और परमात्मा के बीच की कड़ी। वे भक्त की ओर से विष्णु से क्षमा की याचना करती हैं — जैसे माता पिता से पुत्र के लिए क्षमा माँगती है।
श्रीमन् नारायण — “नारायण जो सदा श्री के साथ हैं” — श्री वैष्णव परम्परा का मूल धार्मिक सूत्र है। श्रीरंगम, तिरुमला और काञ्चीपुरम के महामन्दिरों में नित्य पूजा में विष्णु सहस्रनाम और आऴ्वार कवियों के गीतों के साथ अष्टोत्तर का पाठ होता है।
पाठ विधि
परम्परागत पाठ विधि में आचमन, संकल्प, ध्यान (कमल पर विराजित, स्वर्णवर्ण, चतुर्भुज लक्ष्मी), प्रत्येक नाम से पूर्व “ॐ” और पश्चात् “नमः”, और फलश्रुति शामिल है। पद्म पुराण कहता है कि जो भक्त शुक्रवार को पूर्वाभिमुख होकर, लाल वस्त्र पर बैठकर, घी के दीपक के प्रकाश में 108 नामों का भक्तिपूर्ण पाठ करता है, वह इस लोक और परलोक में कभी अभावग्रस्त नहीं होगा।
व्यापक धार्मिक अर्थ
108 नाम सामूहिक रूप से लक्ष्मी का ऐसा चित्र प्रस्तुत करते हैं जो केवल “धन की देवी” की लोकप्रिय समझ से कहीं ऊपर है। वे प्रकृति, विद्या, श्रद्धा, स्वाहा, क्षमा और तुष्टि हैं। ये नाम बताते हैं कि हिन्दू दृष्टिकोण में सच्चा धन केवल भौतिक प्रचुरता नहीं, बल्कि ज्ञान, आस्था, करुणा, सन्तोष और आध्यात्मिक मुक्ति का समावेश है।