प्रस्तावना: चोल त्रयी का रत्नजड़ित आभूषण

यदि तंजावुर का बृहदीश्वर मन्दिर अपने विशाल आकार से दर्शकों को विस्मित करने के लिए बनाया गया आस्था का दुर्ग है, और गंगैकोण्डचोलपुरम का बृहदीश्वर मन्दिर विजय का साम्राज्यिक घोषणापत्र है, तो दारासुरम का ऐरावतेश्वर मन्दिर प्रस्तर में उकेरा गया एक रत्नजड़ित आभूषण है — अपनी दोनों बड़ी बहनों से छोटा, किन्तु मूर्तिकला की सूक्ष्मता और कलात्मकता में दोनों से श्रेष्ठ। तमिलनाडु के तंजावुर जिले में कुम्भकोणम नगर से मात्र तीन किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित यह बारहवीं शताब्दी की अद्वितीय कृति चोल सम्राट राजराज द्वितीय (शासनकाल 1146—1173 ई.) द्वारा निर्मित है और इसका निर्माण लगभग 1166 ईस्वी में पूर्ण हुआ।

यूनेस्को ने 2004 में इस मन्दिर को “महान जीवन्त चोल मन्दिर” विश्व धरोहर स्थल के विस्तार के रूप में अंकित किया, जिसमें तंजावुर और गंगैकोण्डचोलपुरम के मन्दिर पहले से 1987 से सम्मिलित थे। यूनेस्को ने इन तीनों मन्दिरों की सामूहिक रूप से “स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला और कांस्य ढलाई में चोलों की उत्कृष्ट उपलब्धियों” की साक्षी के रूप में प्रशंसा की है। फिर भी, द्राविड़ कला के विशेषज्ञों के बीच ऐरावतेश्वर मन्दिर सर्वाधिक प्रशंसा का पात्र है, क्योंकि चोल साम्राज्य में कहीं और प्रस्तर को इतनी चमत्कारिक सूक्ष्मता से उकेरा नहीं गया — एक इंच की लघु देवमूर्तियों से लेकर गायन करने वाली सीढ़ियों तक।

निर्माता: राजराज चोल द्वितीय

बदलते साम्राज्य में कला के संरक्षक

राजराज चोल द्वितीय ने लगभग 1146 से 1173 ईस्वी तक चोल साम्राज्य पर शासन किया। वे विक्रम चोल के पौत्र और कुलोत्तुंग चोल प्रथम के प्रपौत्र थे। उनके समय तक चोल साम्राज्य राजराज प्रथम या राजेन्द्र प्रथम जैसी विस्तृत सैन्य शक्ति नहीं रखता था, किन्तु यह सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बना रहा। राजराज द्वितीय ने साम्राज्य के संसाधनों को सैन्य अभियानों के स्थान पर कला, साहित्य और मन्दिर-निर्माण में लगाया।

अपने पूर्वजों के विपरीत, जिन्होंने मुख्यतः विद्यमान मन्दिरों का विस्तार और अलंकरण किया, राजराज द्वितीय ने सम्पूर्णतः नवीन पवित्र परिसरों का निर्माण करवाया। वे तमिल साहित्य और कलाओं के संरक्षक भी थे, और दारासुरम का मन्दिर उनकी इस परिष्कृत सौन्दर्यबोध को प्रतिबिम्बित करता है। मन्दिर के शिलालेखों में उनकी उपाधियाँ अंकित हैं, जिनमें “राजकेसरिवर्मन” और “राजगम्भीर” शामिल हैं — इस अन्तिम उपाधि का अर्थ है “शाही गम्भीर व्यक्ति,” जो मन्दिर के महान अग्र-मण्डप राजगम्भीर-तिरु-मण्डपम को भी दी गई।

“ऐरावतेश्वर” नाम की उत्पत्ति

मन्दिर का नाम इसके निर्माता से नहीं, बल्कि पौराणिक गजराज ऐरावत से आया है — जो देवराज इन्द्र का दिव्य वाहन है। स्थल पुराण (स्थानीय मन्दिर कथा) के अनुसार, ऐरावत को ऋषि दुर्वासा ने श्राप दिया कि वह अपना दीप्तिमान श्वेत वर्ण खो देगा। श्राप से पीड़ित महान गजराज पृथ्वी पर भटकता रहा जब तक वह दारासुरम नहीं पहुँचा, जहाँ उसने भगवान शिव की गहन भक्ति से आराधना की और मन्दिर के पवित्र जलकुण्ड में स्नान किया। शिव की कृपा से ऐरावत का मूल तेजस्वी रूप पुनः प्राप्त हो गया, और कृतज्ञ गजराज ने यहाँ प्रतिदिन लिंग की पूजा की। इस प्रकार देवता “ऐरावतेश्वर” — अर्थात “ऐरावत द्वारा पूजित भगवान” — के नाम से विख्यात हुए।

एक दूसरी कथा बताती है कि यमराज भी एक श्राप से पीड़ित थे जिसके कारण उनके सम्पूर्ण शरीर में दाहक संवेदना हो रही थी। यम ने भी इस पवित्र स्थल पर राहत की खोज की, मन्दिर के जलकुण्ड में स्नान किया और शिव की करुणा से तत्काल उपचार प्राप्त किया। तत्पश्चात् उस कुण्ड को “यम-तीर्थम” के नाम से जाना गया, और मन्दिर प्रांगण के दक्षिण-पश्चिम कोने में यम का एक मन्दिर स्थित है — भारत के उन अत्यन्त दुर्लभ मन्दिरों में से एक जहाँ मृत्यु के देवता की विधिवत पूजा होती है।

स्थापत्य: जहाँ अभियांत्रिकी कशीदाकारी से मिलती है

समग्र योजना

ऐरावतेश्वर मन्दिर परिसर लगभग 23 मीटर गुणा 63 मीटर के चबूतरे पर स्थित है और लगभग 107 मीटर (पूर्व-पश्चिम) गुणा 70 मीटर (उत्तर-दक्षिण) की प्रांगण-भित्ति से घिरा है। प्रांगण-भित्ति के बाहर एक नन्दी मण्डप और ध्वजस्तम्भ स्थित हैं। इस मन्दिर को “करक कोविल” — रथ मन्दिर — के रूप में वर्गीकृत किया गया है क्योंकि इसका अग्र-मण्डप दिव्य शोभायात्रा रथ के समान डिज़ाइन किया गया था।

अनेक दक्षिण भारतीय मन्दिर परिसरों के विपरीत जो शताब्दियों में उत्तरोत्तर शासकों द्वारा जोड़े गए भागों से विकसित हुए, ऐरावतेश्वर मन्दिर एक एकीकृत रचना के रूप में एक ही निर्माण अभियान में बनाया गया था, जिसमें कोई बाद की संरचनात्मक वृद्धि नहीं है। यह स्थापत्यगत अखण्डता परिसर को डिज़ाइन और अनुपात की असामान्य सामंजस्यता प्रदान करती है।

विमान: प्रस्तर का मुकुट

मन्दिर का विमान (गर्भगृह-शिखर) गर्भगृह से लगभग 24 मीटर (79 फ़ीट) की ऊँचाई तक उठता है। गर्भगृह स्वयं 12 मीटर भुजा का वर्गाकार है जिसकी मोटी ग्रेनाइट दीवारें हैं। यद्यपि यह तंजावुर के 66 मीटर विमान या गंगैकोण्डचोलपुरम के 53 मीटर शिखर से काफ़ी छोटा है, किन्तु ऐरावतेश्वर का विमान अपनी उत्कीर्ण सतहों की असाधारण परिष्कृतता से इसकी भरपाई करता है।

विमान में क्रमशः ढलते हुए अनेक स्तर हैं जो स्तम्भयुक्त ताखों से अलंकृत हैं, जिनमें शिव के विभिन्न रूपों — भिक्षाटनमूर्ति (भिक्षुक शिव), अर्धनारीश्वर (अर्ध-नर अर्ध-नारी रूप), और नटराज (ब्रह्माण्डीय नर्तक) — की प्रतिमाएँ विराजमान हैं।

महामण्डप: महान सभाकक्ष

गर्भगृह के पूर्व में विस्तृत महामण्डप लगभग 24 मीटर गुणा 18 मीटर का आयताकार कक्ष है। इसमें छह पंक्तियों में अड़तालीस स्तम्भ हैं, प्रत्येक पर असाधारण सूक्ष्मता की लघु प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं। इन स्तम्भों पर विष्णु और ब्रह्मा की उपस्थिति में शिव-विवाह, मुरुगन का विवाह, योग मुद्रा में सरस्वती, आश्चर्यजनक रूप से यथार्थवादी नखों वाली अन्नपूर्णा, और गणेश, शिव, पार्वती व मुरुगन की अचम्भित कर देने वाली एक इंच की लघु प्रतिमाएँ दिखाई देती हैं जो चोल शिल्पकारों की छेनी पर लगभग अतिमानवीय अधिकार प्रदर्शित करती हैं।

अग्र-मण्डप: वह रथ जो कभी चलता नहीं

मन्दिर की सर्वाधिक प्रतिष्ठित स्थापत्य विशेषता अग्र-मण्डप है, जिसे शिलालेखों में राजगम्भीर-तिरु-मण्डपम (“शाही गम्भीर पवित्र सभाकक्ष”) कहा गया है। यह अग्र-कक्ष एक विशाल प्रस्तर रथ — त्रिपुरान्तक रथ — के रूप में डिज़ाइन किया गया है, जिसमें उत्कीर्ण पहिये, तीलियाँ, नाभियाँ और दौड़ते हुए प्रस्तर अश्व सम्मिलित हैं।

मण्डप के दक्षिण भाग में विशाल प्रस्तर रथ-चक्र हैं जो सूर्यघड़ी का भी कार्य करते हैं: पूर्वी ओर का प्रातःकालीन सूर्यघड़ी और पश्चिमी ओर का सायंकालीन सूर्यघड़ी के रूप में। अश्वों को गतिशील दौड़ में दर्शाया गया है, उनके पैर मध्य-सरपट में फैले, अयाल लहराते, और उनकी साज-सज्जा सूक्ष्म विवरण के साथ उत्कीर्ण — सम्पूर्ण रचना स्थिर गति का आभास देती है।

यह रथ अलंकरण मात्र सज्जात्मक नहीं है। शैव धर्मशास्त्र में शिव त्रिपुरान्तक के रूप में तीन आसुरी उड़ने वाले नगरों (त्रिपुर) के विनाश हेतु दिव्य रथ पर सवार होते हैं। रथाकार मण्डप सम्पूर्ण मन्दिर को इस ब्रह्माण्डीय विजय के प्रतीकात्मक पुनर्अभिनय में रूपान्तरित करता है।

संगीतमय सीढ़ी: गायन करते सोपान

ऐरावतेश्वर मन्दिर की सम्भवतः सर्वाधिक प्रसिद्ध विशेषता इसकी संगीतमय सीढ़ी है, जो मुख्य चबूतरे के बाहर बलिपीठ के निकट स्थित है। जंगलेदार सात सोपानों की यह सीढ़ी इस प्रकार अभियांत्रिकी से निर्मित है कि प्रत्येक सोपान थपथपाने या चलने पर एक विशिष्ट संगीत स्वर उत्पन्न करता है, जो भारतीय संगीत सप्तक के सात स्वरों (षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद) के अनुरूप है।

इस ध्वनिक चमत्कार के पीछे की यांत्रिकी अभी भी विवाद का विषय है। कुछ विद्वानों का मानना है कि सोपान विशेष रूप से चयनित अनुनादी गुणों वाले प्रस्तरों से तराशे गए, जबकि अन्य का सुझाव है कि सोपानों के नीचे खोखले कक्ष कम्पन को प्रवर्धित करते हैं। तमिल में इन सीढ़ियों को “इसै पडिक्कल” (संगीतमय सोपान) कहा जाता है।

यह विशेषता चोल दरबार की संगीत और प्रदर्शन कलाओं से गहन संलग्नता का प्रमाण है। देवता के समीप जाने की क्रिया एक प्रदर्शनकारी, लगभग पूजात्मक अनुभव में रूपान्तरित हो जाती है — भक्त दिव्य की ओर प्रत्येक कदम पर सचमुच संगीत रचता है।

मूर्तिकला: एक प्रस्तर विश्वकोश

तिरसठ नायनमार सन्त

मुख्य मन्दिर की दीवारों के आधार पर सतत कथात्मक उत्कीर्ण फलक तिरसठ नायनमारों — तमिल शैव भक्ति आन्दोलन के महान सन्तों — की जीवन कथाओं को दर्शाते हैं। इन कथाओं का मूल स्रोत सेक्किळार द्वारा रचित बारहवीं शताब्दी की संतचरित कृति “पेरिय पुराणम” है। प्रत्येक फलक के साथ सन्त की पहचान और उनके जीवन की मुख्य घटना अंकित करने वाला शिलालेख है।

बरामदे की उत्तरी दीवार में 108 खण्डों के शिलालेख हैं, प्रत्येक में एक शैवाचार्य का नाम, वर्णन और छवि अंकित है। ये उत्कीर्ण फलक-और-शिलालेख मन्दिर की बाहरी दीवारों को पेरिय पुराणम के एक दृश्य संस्करण में रूपान्तरित करते हैं — एक प्रस्तर पुस्तक जिसे निरक्षर भक्त प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करते हुए “पढ़” सकते थे।

दर्शाए गए सन्तों में अप्पर, सम्बन्दर, सुन्दरर और माणिक्कवाचकर शामिल हैं — चार महान शैव भजनकार जिनकी रचनाएँ तेवारम और तिरुवाचकम का निर्माण करती हैं, जो तमिल शैव भक्ति साहित्य के मूलभूत ग्रन्थ हैं।

नृत्य मुद्राएँ और 108 करण

ऐरावतेश्वर मन्दिर शास्त्रीय नृत्य की एक सच्ची दीर्घा है। इसके स्तम्भों और भित्ति-फलकों पर भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित करणों के अनुरूप 108 नृत्य मुद्राएँ अंकित हैं। ये करण शास्त्रीय भारतीय नृत्य की मूल गतिविधि इकाइयाँ हैं, और इनका यहाँ शारीरिक सटीकता के साथ चित्रण — भुजाओं, पैरों, धड़ और शीर्ष की सटीक स्थिति दर्शाते हुए — मन्दिर को नृत्य इतिहासकारों और भरतनाट्यम के अभ्यासकर्ताओं के लिए एक अमूल्य प्राथमिक स्रोत बनाता है।

नृत्य फलक केवल दैवीय आकृतियों तक सीमित नहीं हैं। अनेक फलक राजदरबारी परिवेश में पुरुष और स्त्री नर्तकों को दर्शाते हैं, जो चोल संरक्षण में पल्लवित मन्दिर-नृत्य की समृद्ध परम्परा का संकेत देते हैं। इनके साथ ही वाद्य यन्त्रों — वीणा, मृदंगम, बांसुरी और मंजीरा — के उत्कीर्ण चित्रण हैं, जो चोल प्रदर्शन कला परम्परा का एक व्यापक दृश्य अभिलेख निर्मित करते हैं।

दैनिक जीवन के दृश्य

ऐरावतेश्वर मन्दिर की मूर्तिकला का सर्वाधिक उल्लेखनीय पक्ष लौकिक दैनिक जीवन का विस्तृत चित्रण है। अनेक मन्दिरों के विपरीत जिनकी नक्काशी विशुद्ध रूप से पौराणिक या धर्मशास्त्रीय होती है, दारासुरम मन्दिर की दीवारों पर कृषकों के कार्य, शिल्पकारों के व्यवसाय, संगीतकारों के प्रदर्शन, व्यापारियों के वाणिज्य, शाही शोभायात्राओं, कुश्ती के मैचों और घरेलू गतिविधियों के सजीव दृश्य सम्मिलित हैं। ये उत्कीर्णन बारहवीं शताब्दी के चोल समाज का एक अमूल्य जातीय-वर्णनात्मक अभिलेख प्रदान करते हैं।

दिव्य आकृतियाँ भी प्रचुर हैं: यक्षियाँ और अप्सराएँ ललित त्रिभंग मुद्राओं में उत्कीर्ण हैं, उनके आभूषण, केशसज्जा और वस्त्र ऐसी सूक्ष्मता से अंकित हैं जो श्रेष्ठतम चोल कांस्य कार्य की बराबरी करती है।

पेरिय नायकी अम्मन मन्दिर

मुख्य ऐरावतेश्वर मन्दिर के उत्तर में पेरिय नायकी अम्मन — देवी, शिव की शक्ति — को समर्पित एक पृथक मन्दिर स्थित है। यह मन्दिर मुख्य मन्दिर से कुछ बाद में निर्मित हुआ और दक्षिण भारतीय मन्दिर परिसर के आवश्यक अंग के रूप में अम्मन मन्दिर के उद्भव को प्रदर्शित करता है। बारहवीं शताब्दी तक तमिल शैव धर्म में देवी का सम्प्रदाय इतना प्रमुख हो गया था कि कोई भी प्रमुख शिव मन्दिर उनकी शक्ति के पृथक मन्दिर के बिना पूर्ण नहीं माना जाता था।

पेरिय नायकी अम्मन मन्दिर में अपना मण्डप और गर्भगृह है, जिसमें देवी को उनके सौम्य, मंगलकारी रूप में दिव्य माता के रूप में दर्शाया गया है।

महान जीवन्त चोल मन्दिरों से तुलना

तीन महान जीवन्त चोल मन्दिर एक उल्लेखनीय त्रयी बनाते हैं जो लगभग 150 वर्षों में चोल स्थापत्य महत्वाकांक्षा के विकास का अनुरेखण करती है:

बृहदीश्वर मन्दिर, तंजावुर (1003—1010 ई.): राजराज प्रथम द्वारा चोल साम्राज्यिक शक्ति के शिखर पर निर्मित। इसका 66 मीटर विमान कच्ची स्थापत्य शक्ति की घोषणा है — निर्माण के समय दक्षिण भारत का सर्वोच्च मन्दिर शिखर, 80 टन के शीर्ष-प्रस्तर से सुशोभित।

बृहदीश्वर मन्दिर, गंगैकोण्डचोलपुरम (~1025 ई.): राजेन्द्र प्रथम द्वारा गंगा विजय के उपलक्ष्य में निर्मित। इसका 53 मीटर वक्ररेखीय विमान अधिक ललित, स्त्रैण आकृति प्रस्तुत करता है।

ऐरावतेश्वर मन्दिर, दारासुरम (~1166 ई.): राजराज द्वितीय द्वारा सांस्कृतिक परिष्कार के युग में निर्मित। इसका 24 मीटर विमान तीनों में सबसे छोटा है, किन्तु मूर्तिकला विवरण अद्वितीय सूक्ष्मता के स्तर पर पहुँचता है।

तीनों मन्दिर एक मनोरम प्रक्षेपपथ प्रदर्शित करते हैं: तंजावुर के अभिभूत करने वाले आकार से, गंगैकोण्डचोलपुरम की सन्तुलित भव्यता से होते हुए, दारासुरम की पूर्ण कलात्मकता तक। यदि पहला मन्दिर चोल वंश की शक्ति को स्वर्ग तक पुकारता है, तो अन्तिम मन्दिर उसकी सुसंस्कृतता की फुसफुसाहट है।

शिलालेख और ऐतिहासिक अभिलेख

ऐरावतेश्वर मन्दिर में अनेक शिलालेख हैं जो एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अभिलेखागार का निर्माण करते हैं। तमिल और ग्रन्थ लिपियों में मन्दिर की दीवारों पर उत्कीर्ण ये शिलालेख अंकित करते हैं:

  • राजराज द्वितीय की उपाधियाँ और उपलब्धियाँ, उनकी उपाधि “राजगम्भीर” सहित
  • मन्दिर को भूमि, स्वर्ण और अन्य संसाधनों का दान
  • मन्दिर प्रशासन का विवरण, पुरोहितों, संगीतकारों, नर्तकों और अनुरक्षण कर्मचारियों की भूमिकाएँ
  • कुलोत्तुंग चोल तृतीय (शासनकाल 1178—1218 ई.) द्वारा मन्दिरों के जीर्णोद्धार का एक परवर्ती शिलालेख

संरक्षण और यूनेस्को मान्यता

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ऐरावतेश्वर मन्दिर को संरक्षित स्मारक के रूप में बनाए रखता है। मुख्य मन्दिर और उसकी मूर्तियाँ अच्छी तरह संरक्षित हैं, यद्यपि प्रांगण-भित्ति के गोपुर का ऊपरी भाग नष्ट हो गया है। संरक्षण प्रयास विद्यमान संरचना को स्थिर करने, मूर्तिकला सतहों से संचित जमावों की सफ़ाई और नींव को जल-क्षति से बचाने पर केन्द्रित रहे हैं।

2004 में यूनेस्को अंकन मन्दिर की अन्तरराष्ट्रीय मान्यता के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण था। विश्व धरोहर समिति ने कहा कि तीन महान जीवन्त चोल मन्दिर सामूहिक रूप से “द्राविड़ प्रकार के मन्दिर के शुद्ध रूप की स्थापत्य अवधारणा में एक उत्कृष्ट सृजनात्मक उपलब्धि” का प्रतिनिधित्व करते हैं।

आध्यात्मिक महत्व और जीवन्त पूजा

ऐरावतेश्वर मन्दिर एक सक्रिय शैव तीर्थस्थल बना हुआ है जहाँ लगभग नौ शताब्दियों से अनुरक्षित शैव आगमिक परम्पराओं के अनुसार दैनिक पूजा सम्पन्न होती है। मन्दिर आगमों में निर्धारित पारम्परिक षट्काल पूजा (आरुक्काल पूजा) का पालन करता है।

यम-तीर्थम कुण्ड अनुष्ठानिक स्नान का स्थल बना हुआ है, और भक्तों का विश्वास है कि इसके जल में उपचारात्मक गुण हैं — एक विश्वास जो ऐरावत और यम दोनों के यहाँ उपचार प्राप्त करने की स्थापना कथाओं में निहित है। तमिल मास माशि (फरवरी-मार्च) में मनाया जाने वाला माशि मघम उत्सव तीर्थयात्रियों की बड़ी मण्डलियों को आकर्षित करता है।

नायनमार सन्तों से मन्दिर का सम्बन्ध इसे तमिल शैव भक्ति के तीर्थयात्रा मार्ग पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनाता है, और भक्त जो मन्दिर में आते हैं वे प्रायः सन्तों के जीवन की उत्कीर्ण कथाओं पर चिन्तन करते हुए ध्यानपूर्ण प्रदक्षिणा करते हैं — एक ऐसी प्रथा जो स्थापत्य स्थान को तमिल शैव धर्म के इतिहास की भक्तिमय यात्रा में रूपान्तरित करती है।

दर्शन सूचना और व्यावहारिक विवरण

ऐरावतेश्वर मन्दिर प्रतिदिन प्रातः 8:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक और सायं 4:00 बजे से रात्रि 8:00 बजे तक खुला रहता है। यह कुम्भकोणम नगर केन्द्र से लगभग 3 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में दारासुरम में स्थित है और तंजावुर नगर से लगभग 35 किलोमीटर दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन कुम्भकोणम है।

दर्शनार्थियों को मन्दिर की मूर्तिकला सम्पदा की पूर्ण सराहना के लिए कम से कम दो घण्टे का समय देने की सलाह दी जाती है। प्रातःकालीन घण्टे फोटोग्राफी के लिए सर्वोत्तम प्रकाश प्रदान करते हैं। संगीतमय सीढ़ी, यद्यपि पैरों के यातायात से होने वाली क्षति को रोकने के लिए आंशिक रूप से प्रतिबन्धित है, फिर भी निर्देशित दर्शनों के दौरान अनुभव की जा सकती है।

उपसंहार: चोल वंश की अन्तिम कृति

दारासुरम का ऐरावतेश्वर मन्दिर चोल वंश का अन्तिम स्थापत्य वसीयतनामा है — न सबसे बड़ा, न सबसे ऊँचा, किन्तु निस्सन्देह सबसे सुन्दर। अपने रथाकार मण्डप, गायन करती सीढ़ियों, एक इंच की देवमूर्तियों, और सन्तों व नर्तकों की प्रस्तर कथाओं में यह मन्दिर एक ऐसी सभ्यता को मूर्त करता है जो अपनी कलात्मक परिष्कृतता के शिखर पर थी। जहाँ राजराज प्रथम ने अभिभूत करने के लिए बनाया और राजेन्द्र प्रथम ने विजय के स्मारक के रूप में बनाया, वहीं राजराज द्वितीय ने मुग्ध करने के लिए बनाया। नौ शताब्दियों बाद भी, वह मोहनी बरक़रार है।

ऐरावतेश्वर मन्दिर का प्रत्येक प्रस्तर एक सन्देश वहन करता है: कि दिव्य के प्रति समर्पण को सदैव गरजने की आवश्यकता नहीं — कभी यह गाता है, कभी नृत्य करता है, और कभी इतनी छोटी लघु-प्रतिमाओं में फुसफुसाता है कि चोल शिल्पकारों ने क्या कहा, यह सुनने के लिए प्रस्तर के निकट झुकना पड़ता है। वह फुसफुसाहट, धैर्यवान और शाश्वत, मन्दिर का सर्वश्रेष्ठ अर्घ्य है।