भज गोविन्दम् — जिसे मोह मुद्गर (“मोह को चूर करने वाला हथौड़ा”) भी कहा जाता है — हिन्दू परम्परा की सर्वाधिक प्रिय और व्यापक रूप से पठित भक्तिपरक रचनाओं में से एक है। आदि शंकराचार्य (लगभग 788-820 ई.), अद्वैत वेदान्त के सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादक, को समर्पित यह 31 श्लोकों का स्तोत्र मानवीय आसक्ति की जड़ पर विनाशकारी स्पष्टता से प्रहार करता है और श्रोता से आग्रह करता है कि वह सांसारिक भ्रम को त्यागकर गोविन्द (भगवान विष्णु/कृष्ण) की शरण में आए — इससे पहले कि मृत्यु का अटल आगमन सब भौतिक प्रयासों को व्यर्थ कर दे।
रचना की कथा
काशी का वृद्ध वैयाकरण
भज गोविन्दम् की रचना की परम्परागत कथा सरल और गहन दोनों है। अपने काशी (वाराणसी) प्रवास के दौरान, आदि शंकराचार्य अपने शिष्यों के साथ घाटों पर टहल रहे थे जब उन्होंने एक अत्यन्त वृद्ध व्यक्ति को सीढ़ियों पर बैठे पाणिनि की अष्टाध्यायी के संस्कृत व्याकरण नियमों को कष्टपूर्वक कंठस्थ करते देखा। इस वृद्ध विद्वान को अपने शेष दिन केवल बौद्धिक उपलब्धि — डुकृञ्करणे, क्रिया-रूपावली का व्याकरणिक सूत्र — पर व्यय करते देख शंकराचार्य करुणा से द्रवित हो उठे।
आध्यात्मिक तात्कालिकता के आवेग में उन्होंने प्रथम श्लोक रचा:
भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते । सम्प्राप्ते सन्निहिते काले नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥१॥
अनुवाद: “गोविन्द का भजन करो, गोविन्द का भजन करो, गोविन्द का भजन करो, हे मूढ़ बुद्धि! जब मृत्यु का नियत समय निकट आएगा, तब व्याकरण के नियम तुम्हारी रक्षा नहीं करेंगे।”
“भज गोविन्दम्” की त्रिवार पुनरावृत्ति केवल अलंकारिक बल नहीं — यह तीव्र जागृति का आह्वान है, मानो शंकराचार्य श्रोता को गहन आध्यात्मिक निद्रा से झकझोर रहे हों।
शिष्यों का योगदान
अपने गुरु के इस स्वतःस्फूर्त श्लोक से प्रेरित होकर, शंकराचार्य के चौदह प्रमुख शिष्यों ने प्रत्येक ने एक-एक श्लोक रचा। ये चौदह श्लोक सामूहिक रूप से चतुर्दश-मञ्जरिका स्तोत्रम् कहलाते हैं। शंकराचार्य ने स्वयं अन्त में पाँच और श्लोक जोड़े। 31 श्लोकों की यह समग्र रचना भज गोविन्दम् और मोह मुद्गर दोनों नामों से प्रसिद्ध हुई।
प्रमुख श्लोक
धन के मोह पर (श्लोक 2)
मूढ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् । यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥२॥
अनुवाद: “हे मूढ़, धन संचय की तृष्णा त्यागो। मन में सद्बुद्धि और वैराग्य उत्पन्न करो। अपने कर्मों से जो भी धन प्राप्त हो, उसी में चित्त को सन्तुष्ट रखो।“
जीवन की अनित्यता पर (श्लोक 4)
नलिनीदलगतजलमतितरलं तद्वज्जीवितमतिशयचपलम् । विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥४॥
अनुवाद: “कमल-पत्र पर पड़ी जल-बूँद जैसी अत्यन्त चंचल है, वैसा ही यह जीवन अत्यन्त चपल है। जानो कि यह सम्पूर्ण संसार रोग, अभिमान और शोक से ग्रस्त है।”
कमल-पत्र पर जल की छवि अद्भुत काव्यात्मक चयन है — जल पत्र पर स्थित प्रतीत होता है परन्तु कभी सच में उससे जुड़ा नहीं; किसी भी क्षण हलकी हवा उसे ढुलका देती है। ऐसा ही मानव जीवन है।
सम्बन्धों की क्षणभंगुरता पर (श्लोक 5)
यावद्वित्तोपार्जनसक्तः स्तावन्निजपरिवारो रक्तः । पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥५॥
अनुवाद: “जब तक धन कमाने की शक्ति है, तब तक परिवार में अनुराग है। परन्तु जब शरीर जर्जर हो जाता है, तो घर में कोई हालचाल भी नहीं पूछता।“
जीवन की अवस्थाएँ (श्लोक 7)
बालस्तावत्क्रीडासक्तः तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः । वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः परमे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥७॥
अनुवाद: “बालक खेल में आसक्त, युवक तरुणी में आसक्त, वृद्ध चिन्ता में आसक्त — परन्तु परम ब्रह्म में, हाय, कोई भी आसक्त नहीं!”
यह श्लोक सम्पूर्ण मानव जीवन को तीन विनाशकारी पंक्तियों में समेट लेता है। प्रत्येक अवस्था अपने विशेष मोह लाती है, और त्रासदी यह है कि कोई भी अवस्था स्वाभाविक रूप से मन को परमात्मा की ओर नहीं मोड़ती।
सत्य ज्ञान का उपदेश (श्लोक 9)
सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम् । निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥९॥
अनुवाद: “सत्संग से निस्संगता, निस्संगता से निर्मोहता, निर्मोहता से निश्चल तत्त्व-बोध, और निश्चल तत्त्व-बोध से जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है।”
यह सम्भवतः सम्पूर्ण रचना का सर्वाधिक दार्शनिक रूप से सघन श्लोक है। चार सोपानों में शंकराचार्य संसार से मोक्ष तक का सम्पूर्ण मार्ग चित्रित करते हैं:
- सत्संग — आरम्भिक उत्प्रेरक
- निस्संगता — सत्संग का फल
- निर्मोहता — निस्संगता का फल
- निश्चल-तत्त्व — स्पष्टता का फल
- जीवन्मुक्ति — परम फल
अन्तिम श्लोक (श्लोक 31)
गुरुचरणाम्बुज निर्भरभक्तः संसारादचिराद्भव मुक्तः । सेन्द्रियमानसनियमादेवं द्रक्ष्यसि निजहृदयस्थं देवम् ॥३१॥
अनुवाद: “गुरु के चरणकमलों में पूर्ण भक्ति रखो और शीघ्र ही संसार-बन्धन से मुक्त हो जाओ। इन्द्रियों और मन के नियमन से तुम अपने ही हृदय में स्थित देव के दर्शन करोगे।“
दार्शनिक आधार
अद्वैत वेदान्त और भक्ति
भज गोविन्दम् एक आभासी विरोधाभास प्रस्तुत करता है: शंकराचार्य — अद्वैत वेदान्त के परम आचार्य, जो मानते हैं कि जीवात्मा ब्रह्म से अभिन्न है और यह जगत् माया है — यहाँ सगुण देवता (गोविन्द) की भक्ति का उपदेश दे रहे हैं।
इसका समाधान शंकराचार्य के स्वयं के उपदेश में है। विवेकचूडामणि (श्लोक 31-32) में वे भक्ति को साधक के आवश्यक गुणों (साधन-चतुष्टय) में से एक मानते हैं। शंकराचार्य के लिए भक्ति ज्ञान की विरोधी नहीं, बल्कि उसकी अनिवार्य पूर्वशर्त है। भक्ति हृदय को शुद्ध करती है (चित्तशुद्धि), जिससे वह आत्मज्ञान ग्रहण करने योग्य बनता है।
वैराग्य: उपदेश का सार
भज गोविन्दम् का प्रमुख विषय वैराग्य — विरक्ति या अनासक्ति — है। प्रत्येक श्लोक आसक्ति की पकड़ को ढीला करने के लिए रचा गया है — धन, यौवन, सौन्दर्य, परिवार, विद्वत्ता, और जीवन से भी। यह निराशावाद या संसार-द्वेष नहीं, बल्कि वही है जिसे शंकराचार्य विवेक कहते हैं — नित्य और अनित्य के बीच विवेचन की क्षमता।
‘अभी’ की तात्कालिकता
जो बात भज गोविन्दम् को व्यवस्थित दार्शनिक ग्रन्थों से भिन्न करती है, वह है इसकी तात्कालिकता। प्रतिपद — भज गोविन्दम् — कोमल सुझाव नहीं, बल्कि एक व्याकुल आदेश है। प्रथम श्लोक का सम्प्राप्ते सन्निहिते काले (“जब नियत समय निकट आए”) सम्पूर्ण रचना को मृत्यु-स्मरण पर केन्द्रित करता है।
महाभारत (शान्तिपर्व 174.33) कहता है: अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् । शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् — “प्रतिदिन प्राणी यमलोक जा रहे हैं। शेष लोग चिरजीवन की कामना करते हैं — इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है?”
साधना में भज गोविन्दम्
पठन और गायन
भज गोविन्दम् भारत में सर्वाधिक गाई जाने वाली भक्तिपरक रचनाओं में से एक है। इसके श्लोक कर्णाटक और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय परम्पराओं में विभिन्न रागों में गाए जाते हैं। एम.एस. सुब्बलक्ष्मी की प्रस्तुति सर्वाधिक प्रसिद्ध है।
यह स्तोत्र विशेष रूप से शंकर जयन्ती, एकादशी, चातुर्मास और नवरात्रि काल में गाया जाता है।
शिक्षण-साधन के रूप में
अपनी सुगम भाषा, सजीव कल्पनाओं और व्यावहारिक दृष्टिकोण के कारण, भज गोविन्दम् वेदान्त अध्ययन में परिचयात्मक ग्रन्थ के रूप में प्रयुक्त होता रहा है। अनेक वेदान्तिक शिक्षण परम्पराएँ इसे शंकराचार्य के अधिक तकनीकी ग्रन्थों — उपदेशसाहस्री, विवेकचूडामणि, या प्रस्थानत्रय के भाष्य — से पूर्व की प्रारम्भिक पाठ्यसामग्री के रूप में उपयोग करती हैं।
इस स्तोत्र की प्रतिभा इसकी उस क्षमता में है कि यह अद्वैत वेदान्त के गहनतम सत्यों को — संसार की मिथ्या, आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता, वैराग्य और विवेक की अनिवार्यता को — सरल, भावनात्मक रूप से प्रभावशाली छवियों के माध्यम से सम्प्रेषित करता है जिन्हें समझने के लिए किसी दार्शनिक प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं। कमल-पत्र पर जल की बूँद, व्याकरण रटता वृद्ध, जर्जर पिता को त्यागता परिवार — ये छवियाँ मन में जलती रहती हैं और वह कार्य सम्पन्न करती हैं जो दीर्घ दार्शनिक तर्क भी न कर सके: हृदय का सच्चा परमात्मा की ओर मुड़ना।
जैसा शंकराचार्य स्वयं नौवें श्लोक में कहते हैं, यह परिवर्तन सत्संग — सन्तों की संगति — में आरम्भ होता है। और भज गोविन्दम्, सहस्र से अधिक वर्षों से गाया और पठित, ठीक वही कार्य करता रहता है: शताब्दियों के पार से बुद्धि की वाणी, प्रत्येक श्रोता को सांसारिक मोह के स्वप्न से जागने और हृदय में विराजमान शाश्वत गोविन्द की खोज करने का आह्वान।