द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् शैव भक्ति परंपरा में सर्वाधिक पठित स्तोत्रों में से एक है। आदि शंकराचार्य (आठवीं शताब्दी) को समर्पित यह संक्षिप्त किंतु अत्यंत पवित्र स्तोत्र भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों — स्वयंभू प्रकट ज्योतिर्मय लिंगों — का गुणगान करता है, जो समस्त हिंदू धर्म में सर्वोच्च तीर्थस्थल माने जाते हैं। ज्योतिर्लिंग शब्द ज्योति (दीप्तिमान प्रकाश) और लिंग (शिव का पवित्र चिह्न) से मिलकर बना है, जो उन स्थानों का संकेत करता है जहाँ शिव ने सर्वप्रथम एक अनंत अग्निस्तम्भ के रूप में स्वयं को प्रकट किया, जो ब्रह्मा और विष्णु दोनों से परे था।

यह स्तोत्र दो प्रमुख पाठों में उपलब्ध है: एक लघु (संक्षिप्त) रूप जो चार श्लोकों में प्रत्येक ज्योतिर्लिंग का नाम और स्थान बताता है, तथा एक विस्तृत रूप जो तेरह श्लोकों में प्रत्येक धाम पर अलग-अलग भक्तिपूर्ण ध्यान प्रस्तुत करता है। दोनों पाठ नीचे प्रस्तुत हैं।

लघु (संक्षिप्त) स्तोत्रम् — पूर्ण पाठ

देवनागरी

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् । उज्जयिन्यां महाकालं ॐकारममलेश्वरम् ॥१॥

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम् । सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥२॥

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे । हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ॥३॥

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः । सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥४॥

IAST लिप्यंतरण

Saurāṣṭre Somanāthaṃ ca Śrīśaile Mallikārjunam | Ujjayinyāṃ Mahākālaṃ Oṃkāram Amaleśvaram ||1||

Paralyāṃ Vaidyanāthaṃ ca Ḍākinyāṃ Bhīmaśaṅkaram | Setubandhe tu Rāmeśaṃ Nāgeśaṃ Dārukāvane ||2||

Vārāṇasyāṃ tu Viśveśaṃ Tryambakaṃ Gautamītaṭe | Himālaye tu Kedāraṃ Ghuśmeśaṃ ca Śivālaye ||3||

Etāni Jyotirliṅgāni Sāyaṃ Prātaḥ Paṭhennaraḥ | Saptajanmakṛtaṃ Pāpaṃ Smaraṇena Vinaśyati ||4||

पद्य-अनुवाद

श्लोक १: सौराष्ट्र (गुजरात) में सोमनाथ; श्रीशैल (आंध्र प्रदेश) में मल्लिकार्जुन; उज्जयिनी (उज्जैन, मध्य प्रदेश) में महाकाल; और ॐकार (नर्मदा नदी के द्वीप पर) अमलेश्वर (ॐकारेश्वर)।

श्लोक २: परली (परली वैजनाथ, महाराष्ट्र) में वैद्यनाथ; डाकिनी (भीमाशंकर, महाराष्ट्र) में भीमशंकर; सेतुबंध (रामेश्वरम्, तमिलनाडु) में रामेश; और दारुकावन में नागेश (नागेश्वर, गुजरात)।

श्लोक ३: वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में विश्वेश (विश्वनाथ); गौतमी (गोदावरी नदी, महाराष्ट्र) के तट पर त्र्यम्बक (त्र्यम्बकेश्वर); हिमालय में केदार (केदारनाथ, उत्तराखंड); और शिवालय (एलोरा, महाराष्ट्र) में घुश्मेश (घृष्णेश्वर)।

श्लोक ४ (फलश्रुति): जो मनुष्य सायंकाल और प्रातःकाल इन ज्योतिर्लिंगों के नामों का पाठ करता है, उसके सात जन्मों में संचित पाप केवल स्मरण मात्र से नष्ट हो जाते हैं।

विस्तृत स्तोत्रम् — प्रत्येक ज्योतिर्लिंग के लिए अलग श्लोक

शंकराचार्य को समर्पित विस्तारित पाठ प्रत्येक धाम पर भक्तिपूर्ण ध्यान प्रस्तुत करता है:

१. सोमनाथ — सौराष्ट्र, गुजरात

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम् । भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ॥

सौराष्ट्र के उज्ज्वल और अत्यंत रमणीय देश में, ज्योतिर्मय, चंद्रकला से अलंकृत, भक्तों को भक्ति प्रदान करने हेतु कृपापूर्वक अवतरित सोमनाथ की मैं शरण लेता हूँ।

गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ को परंपरागत रूप से प्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है। शिव पुराण (कोटि रुद्र संहिता, अध्याय ३१-३४) में वर्णन है कि चंद्रमा (सोम) को दक्ष ने शाप दिया था क्योंकि वे अपनी सत्ताईस पत्नियों में रोहिणी को विशेष प्रेम करते थे। सोम ने प्रभास में कठोर तपस्या की और शिव ने उनकी कांति को घटते-बढ़ते चक्र में पुनर्स्थापित किया। कृतज्ञ सोम ने इस लिंग की स्थापना की। यह मंदिर शताब्दियों में अनेक बार ध्वस्त और पुनर्निर्मित हुआ, जो आस्था की अविनाशिता का प्रमाण है। उत्तर भारत में सोमनाथ की यात्रा सदैव से शैव भक्तों के लिए सर्वोच्च आकांक्षा रही है।

२. मल्लिकार्जुन — श्रीशैलम्, आंध्र प्रदेश

श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम् । तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम् ॥

श्रीशैल के शिखर पर, देवताओं के मध्य, उस ऊँचे पर्वत पर प्रसन्नतापूर्वक निवास करने वाले मल्लिकार्जुन को — जो संसार-सागर का एकमात्र सेतु हैं — मैं नमन करता हूँ।

मल्लिकार्जुन कृष्णा नदी के तट पर नल्लामला पर्वतश्रेणी में विराजमान है। इसका नाम मल्लिका (चमेली, पार्वती का प्रतीक) और अर्जुन (शिव का दीप्तिमान रूप) से मिलकर बना है। शिव पुराण के अनुसार जब कार्तिकेय रुष्ट होकर माता-पिता से दूर चले गए, तो शिव और पार्वती ने उनका अनुसरण करते हुए इस पर्वत पर स्वयं को मल्लिकार्जुन के रूप में स्थापित किया।

३. महाकालेश्वर — उज्जैन, मध्य प्रदेश

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् । अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम् ॥

अवन्तिका (उज्जैन) में, सज्जनों को मुक्ति प्रदान करने और अकाल मृत्यु से रक्षा करने हेतु अवतरित महाकाल — देवताओं के महान ईश्वर — को मैं वंदन करता हूँ।

महाकालेश्वर एकमात्र ज्योतिर्लिंग है जो स्वयंभू (स्वतः प्रकट) और दक्षिणामुखी (दक्षिण की ओर मुख) है, जो शिव के मृत्यु-विजेता रूप से संबद्ध है। शिव पुराण में वर्णित है कि कैसे शिव ने अवंती के भक्तों को कष्ट देने वाले दूषण राक्षस का वध किया और महाकाल — “महान काल” — के रूप में प्रकट हुए। यहाँ प्रातःकाल की प्रसिद्ध भस्म आरती अद्वितीय है, जो समस्त शिव मंदिरों में कहीं और नहीं होती। उत्तर भारत के अनेक शिव भक्त, विशेषकर मालवा और राजस्थान क्षेत्र से, महाकाल दर्शन को अपने जीवन की सर्वोच्च आध्यात्मिक उपलब्धि मानते हैं।

४. ॐकारेश्वर — मांधाता द्वीप, मध्य प्रदेश

कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय । सदैवमान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे ॥

कावेरी और नर्मदा के पवित्र संगम पर, सज्जनों के उद्धार हेतु सदा मांधाता नगरी में निवास करने वाले ॐकारेश्वर — एकमात्र मंगलकारी ईश्वर — की मैं स्तुति करता हूँ।

ॐकारेश्वर नर्मदा नदी में एक प्राकृतिक द्वीप पर स्थित है जो पवित्र अक्षर के आकार का है। शिव पुराण में वर्णित है कि विंध्य पर्वत ने यहाँ कठोर तपस्या की और शिव ने प्रसन्न होकर दो रूपों में प्रकट हुए — ॐकारेश्वर और अमलेश्वर (मामलेश्वर) — नदी के दोनों तटों पर। नर्मदा परिक्रमा करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए ॐकारेश्वर एक अनिवार्य पड़ाव है।

५. वैद्यनाथ — देवघर, झारखंड

पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् । सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि ॥

पूर्वोत्तर में, दीप्तिमान निधान में, सदा गिरिजा (पार्वती) सहित निवास करने वाले, जिनके चरणकमलों की देव और असुर दोनों अर्चना करते हैं — ऐसे श्री वैद्यनाथ को मैं नमन करता हूँ।

वैद्यनाथ का अर्थ है “वैद्यों के नाथ।” शिव पुराण में वर्णित है कि रावण ने कैलास पर्वत पर अत्यंत कठोर तपस्या के बाद शिव को लंका ले जाने का प्रयास किया। शिव ने प्रसन्न होकर भी परीक्षा स्वरूप इस स्थान पर अचल हो गए और फिर रावण के घावों को ठीक किया, जिससे उन्हें वैद्यनाथ की उपाधि मिली। देवघर का यह धाम प्रसिद्ध श्रावणी मेला का केंद्र है, जो भारत की सबसे बड़ी वार्षिक तीर्थयात्राओं में से एक है। उत्तर भारत और बिहार-झारखंड के लाखों कांवड़िये प्रतिवर्ष श्रावण मास में सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर बाबा वैद्यनाथ का अभिषेक करते हैं।

६. नागेश्वर — दारुकावन, गुजरात

याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः । सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये ॥

अत्यंत रमणीय दक्षिणी नगर में, विभिन्न ऐश्वर्यों से विभूषित, सच्ची भक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाले एकमात्र ईश्वर श्री नागनाथ की मैं शरण लेता हूँ।

नागेश्वर (नागनाथ) गुजरात में द्वारका के समीप स्थित है। शिव पुराण में भक्त दम्पति सुप्रिय और दारुका की कथा वर्णित है: जब दारुक राक्षस ने शिवभक्तों को बंदी बनाया, तो सुप्रिय ने पंचाक्षर मंत्र (ॐ नमः शिवाय) का जाप किया और शिव नागेश्वर के रूप में प्रकट होकर राक्षस का वध कर भक्तों को मुक्त किया।

७. केदारनाथ — हिमालय, उत्तराखंड

महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः । सुरासुरैर्यक्षमहोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे ॥

महापर्वत के पार्श्व और तट पर विहार करने वाले, श्रेष्ठ मुनियों, देवों, असुरों, यक्षों और महानागों द्वारा सतत पूजित — ऐसे केदारेश्वर, एकमात्र मंगलकारी ईश्वर की मैं स्तुति करता हूँ।

केदारनाथ मंदाकिनी नदी के उद्गम के समीप ३,५८३ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। शिव पुराण में वर्णित है कि कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद पांडव शिव से क्षमा माँगने आए। शिव ने बैल (नंदी) का रूप धारण कर भूमि में समा गए; उनका कूबड़ पृथ्वी पर शेष रहा जो त्रिकोणाकार शिला के रूप में केदार लिंग के रूप में पूजित है। यह मंदिर वर्ष में केवल छह माह (अक्षय तृतीया से कार्तिक पूर्णिमा तक) खुला रहता है। उत्तर भारत के शिवभक्तों के लिए केदारनाथ की यात्रा जीवन की सबसे पवित्र अनुभूतियों में से एक मानी जाती है, विशेषकर चारधाम यात्रा के अंतर्गत।

८. त्र्यम्बकेश्वर — नासिक, महाराष्ट्र

सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरीतीरपवित्रदेशे । यद्दर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे ॥

सह्याद्रि के निर्मल शिखर पर, गोदावरी तट के पवित्र प्रदेश में निवास करने वाले, जिनके दर्शन मात्र से पातक शीघ्र नष्ट होता है — ऐसे त्र्यम्बकेश्वर की मैं स्तुति करता हूँ।

त्र्यम्बकेश्वर नासिक के निकट एक विशिष्ट ज्योतिर्लिंग है जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव (त्रिमूर्ति) के तीन मुख प्रदर्शित हैं। गोदावरी नदी का उद्गम इस मंदिर के समीप ब्रह्मगिरि पर्वत से होता है। शिव पुराण के अनुसार, ऋषि गौतम पर मिथ्या गोहत्या का आरोप लगने के बाद उन्होंने कठोर तपस्या की। शिव ने प्रसन्न होकर गोदावरी (गौतमी) को अपनी जटाओं से मुक्त किया और यहाँ त्र्यम्बकेश्वर — “तीन नेत्रों वाले भगवान” — के रूप में विराजमान हुए।

९. रामेश्वरम् — सेतुबंध, तमिलनाडु

सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः । श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ॥

ताम्रपर्णी जल के संगम पर, असंख्य बाणों से सेतु बाँधकर, श्री रामचंद्र द्वारा स्थापित — ऐसे रामेश्वर को मैं सदा नमन करता हूँ।

रामेश्वरम् भारत के दक्षिण-पूर्वी छोर पर रामायण से अभिन्न रूप से जुड़ा है। लंका जाने से पूर्व श्री राम ने रावण-वध से उत्पन्न ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त हेतु यहाँ शिवलिंग की स्थापना की। मंदिर का १,२१२ स्तंभों वाला गलियारा भारत का सबसे लंबा है। उत्तर भारत की परंपरा के अनुसार तीर्थयात्री काशी से गंगाजल लाकर रामेश्वर का अभिषेक करते हैं और रामेश्वर से जल लाकर काशी में चढ़ाते हैं — इस प्रकार दोनों ज्योतिर्लिंगों को जल के पवित्र तत्व से जोड़ते हैं।

१०. भीमाशंकर — सह्याद्रि, महाराष्ट्र

यं डाकिनीशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च । सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शंकरं भक्तहितं नमामि ॥

डाकिनियों, शाकिनियों और पिशाचों की सभाओं में सेवित, सदा भीम आदि नामों से प्रसिद्ध — ऐसे भक्तहितकारी शंकर को मैं नमन करता हूँ।

भीमाशंकर महाराष्ट्र की सह्याद्रि पर्वतश्रेणी में घने वनों से घिरा है और भीमा नदी का उद्गम स्थल है। शिव पुराण में कुम्भकर्ण के पुत्र भीम राक्षस की कथा वर्णित है जिसने देवों और भक्तों को त्रस्त किया। शिव ने प्रकट होकर राक्षस का वध किया और शिव के कॉस्मिक युद्ध से निकला पसीना भीमरथी (भीमा) नदी बनी।

११. विश्वनाथ — वाराणसी, उत्तर प्रदेश

सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् । वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥

आनंदवन में सानंद निवास करने वाले, समस्त आनंद के मूल, पापसमूह के विनाशक, वाराणसी के नाथ, अनाथों के नाथ — ऐसे श्री विश्वनाथ की मैं शरण लेता हूँ।

काशी विश्वनाथ वाराणसी में स्थित संभवतः सबसे प्रसिद्ध शिव मंदिर है। स्कंद पुराण के काशी खण्ड में घोषणा है कि प्रलय काल में भी शिव इस नगरी को कभी नहीं छोड़ते — वे काशी को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं। विश्वनाथ — “विश्व के नाथ” — उपाधि शिव की सर्वोच्च प्रभुसत्ता की पुष्टि करती है। मान्यता है कि काशी में शिव द्वारा तारक मंत्र सुनते हुए मृत्यु होने पर तत्काल मोक्ष प्राप्त होता है। उत्तर भारत में यह कहावत प्रचलित है — “काशी मरणान्मुक्तिः” — काशी में मरण से मुक्ति मिलती है। नवनिर्मित काशी विश्वनाथ कॉरिडोर ने इस प्राचीन ज्योतिर्लिंग के दर्शन को और भी सुगम और भव्य बना दिया है।

१२. घृष्णेश्वर — एलोरा, महाराष्ट्र

इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम् । वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये ॥

इस सुंदर और विशाल इलापुर में, जगत में सर्वश्रेष्ठ, अत्यंत उदार स्वभाव वाले — ऐसे घृष्णेश्वर को मैं वंदन और शरण लेता हूँ।

घृष्णेश्वर (घुश्मेश्वर) महाराष्ट्र में एलोरा गुफाओं के समीप स्थित बारहवाँ और अंतिम ज्योतिर्लिंग है। शिव पुराण में भक्त महिला घृष्णा (कुसुमा) की कथा है जिसके पुत्र की ईर्ष्यालु सौतन ने हत्या कर दी। घृष्णा ने शिव में अटल भक्ति रखते हुए अवशेषों को निकटस्थ सरोवर में विसर्जित किया तो बालक पुनर्जीवित हो गया। शिव ने घृष्णेश्वर के रूप में प्रकट होकर सभी को आशीर्वाद दिया।

फलश्रुति (समापन आशीर्वचन)

ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण । स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ॥

शिवस्वरूप बारह ज्योतिर्मय लिंगों का यह स्तोत्र क्रमानुसार कथित किया गया है — जो मनुष्य इसे अत्यंत भक्ति से पाठ करता है, वह इसका फल प्राप्त कर अपने आत्मस्वरूप में भगवान की पूजा करेगा।

शिव पुराण में उत्पत्ति

बारह ज्योतिर्लिंगों का शास्त्रीय आधार मुख्यतः शिव पुराण में, विशेषकर विद्येश्वर संहिता (अध्याय ६-१२) और कोटि रुद्र संहिता (अध्याय १४-४३) में मिलता है। इसकी ब्रह्मांडीय उत्पत्ति कथा इस प्रकार है:

एक बार ब्रह्मा और विष्णु में यह विवाद हुआ कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। शिव ने दोनों के मध्य एक अनंत प्रज्वलित ज्योतिस्तम्भ के रूप में प्रकट होकर — जिसका न आदि था न अंत — इस विवाद का समाधान किया। ब्रह्मा ने हंस का रूप धारण कर ऊपर उड़े; विष्णु ने वराह रूप में नीचे खोदा। दोनों स्तम्भ की सीमा नहीं पा सके। विष्णु ने विनम्रतापूर्वक शिव की सर्वोच्चता स्वीकार की; ब्रह्मा ने मिथ्या दावा किया कि उन्होंने शिखर पा लिया है। शिव ने तब अपना स्वरूप प्रकट किया, ब्रह्मा को शाप दिया (कि उनकी अलग मंदिर पूजा नहीं होगी) और विष्णु को आशीर्वाद दिया। जिन बारह स्थानों पर यह अनंत ज्योतिस्तम्भ पृथ्वी को भेदकर प्रकट हुआ, वे बारह ज्योतिर्लिंग बने — प्रत्येक वह बिंदु जहाँ निराकार परम तत्व ने भक्तों के कल्याण हेतु साकार रूप में निवास करना स्वीकार किया।

बारह ज्योतिर्लिंगों का भौगोलिक मानचित्रण

बारह ज्योतिर्लिंग भारतीय उपमहाद्वीप के कोने-कोने में फैले हैं, जो एक पवित्र भूगोल रचते हैं:

क्रमज्योतिर्लिंगस्थानराज्यक्षेत्र
सोमनाथप्रभास पाटनगुजरातपश्चिम
मल्लिकार्जुनश्रीशैलम्आंध्र प्रदेशदक्षिण
महाकालेश्वरउज्जैनमध्य प्रदेशमध्य
ॐकारेश्वरमांधाता द्वीपमध्य प्रदेशमध्य
वैद्यनाथदेवघरझारखंडपूर्व
नागेश्वरदारुकावन (द्वारका)गुजरातपश्चिम
केदारनाथकेदारनाथउत्तराखंडउत्तर
त्र्यम्बकेश्वरनासिकमहाराष्ट्रपश्चिम
रामेश्वरम्सेतुबंधतमिलनाडुदक्षिण
१०भीमाशंकरसह्याद्रिमहाराष्ट्रपश्चिम
११विश्वनाथवाराणसीउत्तर प्रदेशउत्तर
१२घृष्णेश्वरएलोरामहाराष्ट्रपश्चिम

यह वितरण आकस्मिक नहीं है। ज्योतिर्लिंग भारतवर्ष का पवित्र मानचित्र रचते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि उपमहाद्वीप का कोई भी क्षेत्र शिव की ज्योतिर्मय उपस्थिति से वंचित न रहे।

तीर्थयात्रा परंपरा

सभी बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन की आकांक्षा — द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा — शैव भक्ति में सदियों से एक संजोया गया आदर्श रहा है। परंपरा के अनुसार:

  • एक जीवनकाल में सभी बारह धामों की परिक्रमा पूर्ण करना असंख्य जन्मों के संचित पापों को नष्ट करता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • यात्रा किसी भी ज्योतिर्लिंग से प्रारंभ हो सकती है, यद्यपि अनेक तीर्थयात्री स्तोत्र के क्रमानुसार सोमनाथ से आरंभ कर घृष्णेश्वर पर समाप्त करते हैं।
  • प्रत्येक धाम पर भक्त अभिषेक, बिल्वपत्र अर्पण, पंचाक्षर मंत्र (ॐ नमः शिवाय) का जाप और इसी स्तोत्र का पाठ करते हैं।
  • श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) ज्योतिर्लिंग तीर्थयात्रा के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है, जब लाखों कांवड़िये गंगाजल लेकर शिव मंदिरों में जाते हैं। उत्तर भारत में, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में, कांवड़ यात्रा सबसे बड़ी वार्षिक शैव तीर्थयात्रा है।

पाठ-विधान

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् का पाठ परंपरागत रूप से निम्नलिखित अवसरों पर किया जाता है:

  1. संध्या पाठ: फलश्रुति में विशेष रूप से सायं प्रातः — सायंकाल और प्रातःकाल — का उल्लेख है, जो दो प्रमुख संध्या कालों से मेल खाता है।

  2. प्रदोष व्रत: प्रत्येक चांद्र पक्ष की त्रयोदशी को, यह स्तोत्र प्रदोष काल (सूर्यास्त के आसपास) में पढ़ा जाता है, जो शिव पूजा के लिए सर्वोत्तम शुभ मुहूर्त माना जाता है।

  3. महाशिवरात्रि: शिवरात्रि की रात ज्योतिर्लिंग स्तोत्र पाठ का सर्वाधिक प्रभावशाली अवसर है। जो भक्त रात के चारों याम (प्रहर) में इसका पाठ करते हैं, उन्हें सभी बारह धामों की यात्रा का पुण्य प्राप्त होता है।

  4. श्रावण सोमवार: श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को भक्त रुद्राभिषेक के साथ इस स्तोत्र का पाठ करते हैं।

  5. तीर्थयात्रा के समय: प्रत्येक ज्योतिर्लिंग धाम पर पूर्ण स्तोत्र का पाठ सभी बारह लिंगों की उपस्थिति का आह्वान करता है, जिससे एक धाम की पूजा सभी बारह की पूजा बन जाती है।

अनुशंसित विधि यह है कि उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठें, दीपक (तेल का दीया) प्रज्वलित करें, शिवलिंग या प्रतिमा पर बिल्वपत्र और श्वेत पुष्प अर्पित करें, और एकाग्रचित्त होकर स्तोत्र का पाठ करें। विशेष अनुष्ठान (साधना) के लिए स्तोत्र १०८ बार पाठ किया जा सकता है।

फलश्रुति — पाठ के लाभ

स्तोत्र का अपना समापन श्लोक सर्वप्रमुख लाभ घोषित करता है: सात जन्मों के पापों का विनाश (सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति)। शैव परंपरा इसे और विस्तारित करती है:

  • अकाल मृत्यु से रक्षा: महाकाल का आह्वान विशेष रूप से अकाल मृत्यु से सुरक्षा का वचन देता है।
  • रोग निवारण: वैद्यनाथ, “वैद्यों के नाथ”, रोग और शारीरिक कष्टों से मुक्ति हेतु आवाहित किए जाते हैं।
  • भय का नाश: ज्योतिर्लिंग, शिव के अनंत प्रकाश के प्रकटीकरण के रूप में, सभी प्रकार के आध्यात्मिक अंधकार और अस्तित्वगत भय को दूर करते हैं।
  • तीर्थयात्रा का समतुल्य पुण्य: जो लोग शारीरिक रूप से सभी बारह स्थलों की यात्रा नहीं कर सकते, वे सच्चे पाठ से पूर्ण यात्रा का आध्यात्मिक पुण्य प्राप्त करते हैं।
  • मोक्ष: विस्तृत फलश्रुति घोषणा करती है कि अतिशय भक्ति से पाठ करने वाला भक्त “फल प्राप्त कर आत्मा में भगवान की पूजा करेगा” — यह आत्म-साक्षात्कार और परम मुक्ति का संकेत है।

शैव भक्ति में महत्त्व

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् हिंदू भक्ति साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखता है क्योंकि यह धार्मिक जीवन के अनेक आयामों को जोड़ता है:

दार्शनिक दृष्टि: यह शिव को अनंत, स्वयंप्रकाश परम तत्व (ज्योति स्वरूप) के रूप में प्रतिपादित करता है। प्रत्येक ज्योतिर्लिंग केवल एक पवित्र स्थान नहीं बल्कि वह बिंदु है जहाँ निराकार साकार में सुलभ होता है।

पवित्र भूगोल: स्तोत्र एक साथ माहात्म्य (गौरवगान) और तीर्थ मालिका (तीर्थस्थलों की माला) है, जो उपमहाद्वीप भर में शिव की उपस्थिति का मानचित्रण करता है और भारतवर्ष की भूमि को शिव के शरीर के रूप में पवित्र करता है।

भक्ति की सुलभता: केवल चार श्लोकों के लघु रूप में, यह स्तोत्र किसी भी भक्त द्वारा याद किया जा सकता है, चाहे उसकी विद्वत्ता कुछ भी हो। यह तीर्थयात्रा के फलों को लोकतांत्रिक बनाता है — निर्धन और अशक्त को वही आध्यात्मिक लाभ प्रदान करता है जो केवल सम्पन्न और स्वस्थ लोग शारीरिक यात्रा द्वारा प्राप्त कर सकते हैं।

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् इस प्रकार एक लघु आकार में सम्पूर्ण आध्यात्मिक साधना के रूप में कार्य करता है — दिव्य का आह्वान, पवित्र का मानचित्रण, पौराणिक का वर्णन और मोक्ष का वचन — यह सब कुछ मुट्ठी भर स्मरणीय श्लोकों में, जो एक सहस्राब्दी से अधिक समय से शिव मंदिरों और भक्तों के घरों में गूँज रहे हैं।